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अमर शहीद “उदइया चमार” जिन्होंने मंगल पाण्डे से 50 वर्ष पहले ही क्रान्ति का बिगुल फ़ून्क दिया था और 19 सितम्बर 1807 को फ़ान्सी के फ़न्दे पर झूल गए थे

अमर शहीद “उदइया चमार” जिन्होंने मंगल पाण्डे से 50 वर्ष पहले ही क्रान्ति का बिगुल फ़ून्क दिया था और 19 सितम्बर 1807 को फ़ान्सी के फ़न्दे पर झूल गए थे. अलीगढ क्षेत्र में इनकी शोर्यगाथाए आज भी आल्हा की तरह गायी-सुनी जाती हैं. ये छ्तारी रियासत की सेना में थे. जब छ्तारी रियासत के विरुद्ध लड़ने के लिए अन्ग्रेज़ सेना गनौरी के किले में पहुंचने वाली थी तब इन्होने पहले ही वहां बारूदी सुरंग बिछा दी थी. उसमें ब्रिटिश आर्मी के सैंकड़ों लोग मारे गए थे. मैंने आल इन्डिया हिस्ट्री कान्ग्रेस की सेमिनार में इनकी शोर्य गाथाओ के ओरल नरेटिवस के आधार पर पढे अपने पर्चे में बताया था कि किस तरह “भद्रलोक के इतिहास” और “आम जनता के इतिहास” में ज़मीन-आसमान का अन्तर है. इतिहास के बही-खातों से दरकिनार कर दिए गए एसे तमाम निम्नवर्गीय क्रान्तिवीरो की शोर्यगाथाओ को जानने के लिए “सम्यक प्रकाशन” से छपी मेरी पुस्तक “1857 की क्रान्ति में दलितो का योगदान” पढे. यह इस बिषय पर लिखी गयी पहली पुस्तक है.

Satnaam Singh

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