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महान समाज सुधारक व् चिंतक महृषि वाल्मीकि जी के विचारों से छेड़छाड़

अमृतसर का बाल्मीकि मंदिर(तीर्थ) जिसे गुगल करेंगे तो नाम बाल्मीकि तीर्थ नहीं राम तीर्थ मिलेगा वहीं की तस्वीर है ये जहाँ पर पिछले साल एक दिन का सेमिनार आयोजित किया गया था. आज भगवान बाल्मीकी की जयंती को पूरा विश्व मना रहा है. शरद पूर्णिमा को प्रकट दिवस के रूप में मनाया जा रहा है. मेरा ये व्यक्तिगत विचार है किसी की आस्था को ठेस पहुँचाना मेरा उद्देश्य नहीं.
मैंने देखा है कि जगह-जगह पर बड़े-बड़े पोस्टर लगे है जिन पर लिखा है:
“रघुकुल रीत सदा चली आयी
प्राण जाये पर वचन न जाई”
ये शब्द महर्षि वाल्मीकि की तस्वीर पर आपको लिखे हुए मिलेंगे यहाँ तक की देश की राजधानी दिल्ली के पंचकुइयाँ रोड पर जो पुराना बाल्मीकी मंदिर है वहाँ भी यही लिखा है. ये लाइनें गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस की अवधी भाषा में लिखी हुई है. तस्वीर महर्षि बाल्मीकी की और लिखावट तुलसीदास जी की आपको तस्वीरों में और मंदिरों में दिखाई देगी. ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि ये समुदाय अभी भी क़लम से दूर है शिक्षित नहीं है, चेतनशील नहीं है जबकि गुरु के हाथ में क़लम है. महर्षि बाल्मीकी ने रामायण की रचना की थी जो संस्कृत मे है न कि अवधी में. इसलिए बाल्मीकी समुदाय अपने गुरु को ही आदर्श मान ले और झाड़ू को छोड़कर क़लम पकड़ लें तभी ये तरक़्क़ी कर सकता है. अन्यथा तो ये अन्याय और शोषण का शिकार होता ही रहा है. बाबा साहेब ने यूँ ही नहीं कहा था कि “शिक्षा शेरनी का दूध है जो पियेगा वही दहाड़ेगा” बाबा साहेब और महर्षि बाल्मीकी दोनो के हाथों में क़लम है इसलिए ये समाज क़लम को पकड़ लें तो कुछ मायने होंगे.
वाल्मीकि समुदाय के लिए महर्षि बाल्मीकी आस्था हो और बाबा साहेब अम्बेडकर रास्ता हो तभी ये समुदाय आगे बढ़ सकता है. बाल्मीकी समुदाय का बड़ा वर्ग महर्षि बाल्मीकी को अपना आराध्य भगवान मानता है. इसलिए आज के दिन ये संकल्प ले कि हम अपने बेटे और बेटियों को इतना पढ़ाएँ कि वे अपना इतिहास ख़ुद लिखे. सभी आस्थावान लोगों को महर्षि बाल्मीकी जयंती की मंगलकामनाएँ.

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Samta Awaz

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